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Thursday, August 17, 2017

#41 # साप्ताहिक चयन: "बू...." / डाॅ जोशना बैनर्जी आडवानी



डाॅ जोशना बैनर्जी आडवानी
बंदिशें बेमुरव्वत होती हैं l


इस दौर में या बीते हुए दौर में या फिर आगे आने वाले दौर में , दौर कोई भी रहा हो एक चीज़ जो नहीं बदलती, वो है बन्दिशें। इंसान पर समाज की बन्दिशें , कमजोर देश पर मजबूत देश की बन्दिशें , गरीबों पर लगाई गयी बन्दिशें , कमजोर पुरुष पर मजबूत पुरुष/महिला  की बन्दिशें आदि आदि । बन्दिशों के इस दौर में सबसे ज़्यादा बंदिशे अगर किसी पर चाहे/ अनचाहे लगाई गईं तो वह मादा जीव ही हैं (जानवरों मे भी गाय से ज्यादा साँढ़ ही खुल्ला छोड़े जाते हैं )  ।  और हमारे समाज की बात करें तो सबसे ज़्यादा  बन्दिशों मे मादा होमो सैपियन्स ही है । बन्दिशों मे जकड़े इन समाज और रिवाजों से Formaldehyde जैसी दुर्गंध सी उठती है । 

ये बन्दिशें कोई भी सहजता और समर्पण से स्वीकार करना नहीं चाहता,  नतीजतन उपजता है अनमनापन और जनमता है प्रतिरोध व प्रतिकार । कहीं ये भावनाएं कोई सकारात्मक स्वरूप ले पाएँ  तो निर्माण करती हैं एक स्वतंत्र विचार का , सोचने के एक नए ढंग का और रचती हैं एक ऐसी दुनिया जहां गलकाट प्रतिस्पर्धा न होकर , सब के लिए उनका एक नियत स्थान होता है । इसी भावना को स्वर देती एक कविता आज प्रस्तुत की जा रही है ।  

कत्थक और भरतनाट्यम नृत्य मे प्रभाकर की  उपाधि से दीक्षित ,  रंगलोक जैसे प्रसिद्ध नाट्य संस्थान में कार्यरत आज की कवियित्री डाॅ जोशना बैनर्जी आडवानी जी का शिक्षा से भी जुड़ाव है आप एक प्रतिष्ठित विद्यालय की  प्रधानाचार्य भी हैं , साथ ही वो FM रेडियो पर कविताओं का वाचन भी करती हैं। आप की कविताओं की चमक आज कल हर हर फ़लक पर दिखती है ।  आप की लिखी कविता “बू....“ को इस सप्ताह के  साप्ताहिक चयन के रूप में नवोत्पल सम्पादकीय समूह द्वारा चयनित किया गया है । आपकी कविता पर सहज टीप की हैआदरणीया  अमिता पाण्डेय जी  ने, आप संवेदनाओं से परिपूर्ण कुशल पाठिका हैं | अमिता जी शुरू से ही नवोत्पल समूह से जुड़ी हुई हैं , आप कविताओं को न सिर्फ पढ़ती हैं बल्कि उन पर एक विचार भी विकसित कर सकने  की हैसियत रखती हैं । 

आइये इस अद्भुत युग्म का आस्वाद करें । 

(डॉ. गौरव कबीर ) 



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बू.... (दुर्गंध)


मैने एक जगह रूक के डेरा डाला
मैने चाँद सितारो को देखा
मैने जगह बदल दी
मैने दिशाओ को जाना
मै अब खानाबदोश हूँ
मै नखलिस्तानो के ठिकाने जानती हूँ
मै अब प्यासी नही रहती
मैने सीखा कि एक चलती हुई चीटी एक उँघते हुये
बैल से जीत सकती है
मुझे बंद दीवारो से बू आती है

मै सोई
मैने सपना देखा कि जीवन एक सुगंधित घाटी है
मै जगी
मैने पाया जीवन काँटो की खेती है
मैने कर्म किया और पाया कि उन्ही काँटो ने
मेरा गंदा खून निकाल दिया
मैने स्वस्थ रहने का रहस्य जाना
मुझे आरामदायक सपनो से बू आती है

मै दुखी हुई
लोगो ने सांत्वना दी और बाद मे हँसे
मै रोई
लोगो ने सौ बाते बनाई
मैने कविता लिखी
लोगो ने तारीफे की
मेरे दुख और आँसू छिप गये
मै जान गई कि लोगो को दुखो के कलात्मक
ढाँचे आकर्षित करते है
मुझे आँसुओ से बू आती है

मैने बातूनियो के साथ समय बिताया
मैने शांत रहना सीखा
मैने कायरो के साथ यात्रा की
मैने जाना कि किन चीज़ो से नही डरना
मैने संगीत सुना
मैने अपने आस पास के अंनत को भर लिया
मै एकाकीपन मे अब झूम सकती हूँ
मुझे खुद के ही भ्रम से बू आती है

मैने अपने बच्चो को सर्कस दिखाया
मुझे जानवर बेहद बेबस लगे
मैने बच्चो से बाते की
उनकी महत्वकांक्षाओ की लपट ऊँची थी
मैने उन्हे अजायबगर और पुस्तकालय मे छोड़ दिया
अब वे मुझे अचम्भित करते है
मैने जाना कि बच्चो के साथ पहला कदम ही
आधी यात्रा है
मुझे प्रतिस्पर्धाओ से बू आती है

मुझे दोस्तो ने शराब पिलाई
मैने नक्सली भावो से खुद को भर लिया
मैने जलसे देखे
मैने अपना अनमोल समय व्यर्थ किया
मै खुद ही मंच पर चढ़ गई
मेरे दोस्त मुझपर गर्व करते है
मैने जाना कि सम्राट सदैव पुरूष नही होते
मुझे खुद के आदतो से बू आती है

मुझे कठिनाईयाँ मिली
मैने मुँह फेर लिया
मैने आलस बन आसान डगर चुनी
मुझे सुकून ना मिला
मैने कठिनाईयो पर शासन किया
मेरी मेहनत अजरता को प्राप्त हुई
मैने देखा कठिनाई अब भूत बन मेरे
पीछे नही भागती
मुझे बैठे हुये लोगो से बू आती है

मैने प्रेम किया
मैने दारूण दुख भोगा
मैने अपने प्रेमी को दूसरी औरतो से अतरंगी
बाते करते देखा
मै जलती रही रात भर
मैने प्रेम को विसर्जित कर दिया
प्रेम ईश्वर के कारखाने का एक मुद्रणदोष है
प्रेम कुष्ठ रोग और तपैदिक से भी भयंकर
एक दिमागी बीमारी है
मुझे उस पल से बू आती है
जब मैने प्रेम किया

 [डाॅ जोशना बैनर्जी आडवानी ]

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"इस लेखन पर कोई क्या कहे जो भीतर घुसकर आपको खामोश कर दे।"

यह कविता उत्तरआधुनिक और  बाजारवाद के दौर की बू वाली कविता है अर्थात् आज की कविता है...यह कविता प्रत्यक्ष रूप में एक महिला द्वारा उसकी ऐसी स्थिति को गुनगुना रही है, जहांँ वह एक ओर पुरानी परम्पराओं और मान्यताओं से संघर्ष कर रही है तो दूसरी ओर तत्कालीन मूल्यहीन समाज और व्यक्तिकेंद्रित महत्वाकांक्षा के दौड़ में उलझी हुई है। इस कविता के उदाहरणों से यूँ समझ सकते हैं की हमारी ऐसी परम्पराएं जहाँ स्त्री सिर्फ घर और आँगन के दायरे में बंधी है, आज के समय में भी स्त्री के लिए दायरे बने हुए है। इसके बरख़्श पुरुष स्वतन्त्र है। समाज में स्त्रियों के प्रति इस भेदभाव के कई उदाहरण मिल जायेंगे, इसलिए कवयित्री कहती है-
 मुझे बंद दीवारो से बू आती है।

ये बंद दीवारें, बंद संकुचित मानसिकता की है....किन्तु वह इन झूठी ढकोसले से भरी रीतियों के समक्ष झुकती नही है, अपितु अपने लिए वह इस रेगिस्तान में भी हरियाली ढूंढ लेती है। वह अपना विकल्प, नखलिस्तान तलाश लेती है, किंतु इसके इतर वह लगातार लिंगभेद के आधार पर बटी सामाजिक व्यवस्था का दंश झेलती रहती है।

कविता की अंतिम पंक्तियों को देखे जहाँ  आज के मूल्यहीन समाज का चरित्र सामने आता है और मानवीय भावनाएं भी मात्र बाजार की वस्तु बनकर रह जाती है। बदलाव का समय ठीक है कि नही ये कोई तय नही कर सकता क्योंकि जीवन का बदलाव  कभी भी, किसी भी परिस्थिति में हो जाता है; हम चाहे या ना चाहे । इसलिए इसमें सकारात्मक रुख पर बने रहना चाहिए, जिससे हम अपनी नकारात्मक परिस्थितियों से उबर सके।          
      
इसे पढ़कर कुछ पंक्तियाँ स्मृति में आ रही है......

"दुनिया में वही शख्स है ताज़ीम के काबिल जिस शख़्स ने हालात का रुख मोड़ दिया हो"

इस कविता की मेरी सबसे पसंदीदा पंक्तियाँ  हैं :
मैने बातूनियो के साथ समय बिताया
मैने शांत रहना सीखा
मैने कायरो के साथ यात्रा की
मैने जाना कि किन चीज़ो से नही डरना
मैने संगीत सुना
मैने अपने आस पास के अंनत को भर लिया
मै एकाकीपन मे अब झूम सकती हूँ
मुझे खुद के ही भ्रम से बू आती है



Thursday, August 10, 2017

#40# साप्ताहिक चयन 'आस' / प्रदीप कुमार '

प्रदीप कुमार
युवा कवि प्रदीप कुमार एक सहज सहृदय कवि हैं l आपकी कवितायेँ बड़ी ही सरलता से जीवन राग सुनाती हैं l नवोत्पल साप्ताहिक चयन की इस प्रविष्टि पर अपना अभिमत दे रहे हैं श्री अमित कुमार श्रीवास्तव 'बेइंतिहा ' जी l 'बेइंतिहा ' जी उम्दा कलमकार हैं और बैंक की उठापठक के बीचोबीच साहित्य सुर साध ही लेते हैं l आप नवोत्पल के पुराने संगी हैं l 

***

   
 आस

जानती हो सहेली
ज़िन्दगी बोझ है
वैसे ही जैसे किरणें होती हैं
सूरज पर बोझ
वो बिखेर देता है
जैसे रात होती है
शाम पर बोझ 
सुबह अकेला छोड़ देती है
जैसे प्यार होता है
मन पर बोझ
अधूरा ही रहता है
संग छोड़ देता है
जैसे खुशबू बोझ होती है
फूलों पर
हमेशा साथ नहीं रहती
इंसान इसी सफर में है
कुछ बोझ,कुछ संग
कुछ बिछड़न
डॉ. गौरव कबीर: CellClicks

देखा है ना विरान पटरियां
वैसी ही है ज़िन्दगी
आगे भी कोई नहीं
पीछे भी
लेकिन जिम्मेदारी के
बोझ से लदी हुई
जैसे पटरी पर मंज़िल का बोझ
सोचा है कभी
क्यों ढो रहे हैं
खून के आंसू रो रहे हैं
क्यों कि आस कभी नहीं मरती
दुःख के इस पार भी
और उस पार भी
हाँ सच में 
सब अच्छा हो जायेगा
जरूर अच्छा हो जायेगा

8 अगस्त 2017





***
कवि क्या है सृजनकर्ता , रचता रहता है शब्दों के नए मायने ,उकेरता रहता है नयी आकृतियाँ , तब्दील करता है कल्पनाओं को यथार्थ में ,अपनी लेखनी से अनवरत पैदा करता है विश्वास और गढ़ देता है एक “आस”...!

प्रदीप भाई ने अपनी इस कविता के माध्यम से आस को कुछ यूँ ही उकेरा है |

जिन्दगी के मायने बोझ से सदा ही बोझिल नही होते , हाँ बोझ को जिम्मेदारी समझ नि:स्वार्थ निर्वहन करना असल मायने में जीजीविषा को परिभाषित करता है | क्या सबमे होता है इतना सामर्थ्य कि वे उठा लें जिम्मेदारियाँ ....प्यार की ,नैतिकता की, सदाचार की ,मंजिलों तक धैर्य की , समर्पण और त्याग की, समरसता की और ना जाने कितने अप्रत्याशित वेदनाओं की ...!

शायद “आस” और इस आस से जुड़े विश्वास से ही संभव हो पता है इन बोझों का उचित निर्वहन |


एक अनमोल एहसास “प्यार’ पर प्रदीप जी ने कहा है कि

“जैसे प्यार होता है

मन पर बोझ

अधूरा ही रहता है

संग छोड़ देता है"



हाँ सच है कि प्यार अक्सर अधूरा ही रह जाता है पर

प्यार अधूरा रहता है पूरा होने की आस में, रहता है सदा के लिए जिंदा किसी के जेहन में और फिर इसी आस के सहारे पनपता रहता है प्यार का उन्स दोनों तरफ़

कविता में एक तरफ बोझ के कारण फूलों का खुशबू से त्याग है तो वहीं दूसरी तरफ वीरान पटरियों की मानिंद जिन्दगी का विश्लेषण जो कहती है कि अंतहीन सामानांतर पटरियों सा जीवन अनन्त ज़िम्मेदारियों और पटरी पर मंजिल का बोझ लिए हुए अथक प्रयासरत है |

पर बोझ का बोझ भी कम हो सकता है जैसे कवि ने कहा कि बस एक आस जिन्दा हो | मेरी राय में कुछ यूँ ही...


“अँधेरा तो सिर्फ देहरी पर है

उस पार है उमीदों और उजास की पूरी दुनिया

अँधेरा तो सिर्फ देहरी पर है"



जैसे प्रदीप भाई कहते हैं-

दुःख के इस पार भी
और उस पार भी
आस कभी नहीं मरती

सब जरूर अच्छा हो जायेगा.

अमित श्रीवास्तव "बेइंतहा"



Tuesday, August 8, 2017

डेढ़ इश्किया .......नारी का डेढ़ विमर्श


 श्री सुरेन सिंह श्रम प्रवर्तन विभाग में वरिष्ठ अधिकारी हैं पर मन रमता है कला और साहित्य  में। थोड़ी देर से    ही सही पर फिल्म डेढ़ इश्किया पर  लिखी उन  की ये  समीक्षा पढ़ने योग्य  है ।  

[मॉडरेटर]


कल शाम विशाल भरद्वाज और अभिषेक चौबे की ‘डेढ़ इश्किया’ देखी .फिल्म बेहतरीन लगी .फिल्म निस्संदेह ‘इश्किया ‘ से डेढ़ गुना ही सिद्ध होती है नारी विमर्श को व्यापकता प्रदान करती हुई जिसमे स्त्री अपना त्राण पति ..प्रेमी से आगे बढ़ कर निज़ स्वतंत्रता के नये आयाम रचती है अपने होने को अपने... अस्तित्व को सेलिब्रेट करते हुए ....स्वतंत्रता को सही सही पहचानते हुए .....और उसे प्राप्त करने हेतु छल –प्रपंच रचती हुई .....सभी प्रकार के मिथ्या भ्रम और शारीरिक ग्लानियो से मुक्त ....स्त्री से मनुष्य बननेकी दिशा में अग्रसर निरन्तर .    स्त्री ,  पुरुष को अपने  मनोरथ  के  लिए  औजार /टूल बना सकती है वो भी परंपरागत भूमिकाओं से परे जाते हुए . ये फिल्म महेश भट्ट की ‘अर्थ’ से दो कदम आगे जाती है . ‘अर्थ’ में नायिका पति और प्रेमी के परंपरागत द्वैत से इतर मार्ग का चुनाव करती है जबकि ‘डेढ़ इश्किया’ में नायिका—द्वय (माधुरी-हुमा) का चुनाव पूर्व नियोजित और निर्धारित है बस उसे प्राप्त करने का मार्ग उसकी स्वतंत्रता है और इस साध्य में पुरुष –द्वय (नसीर-अरशद ) साधन मात्र है । 

और इसी के साथ शायद हमारा सिनेमा थोडा आधुनिक हो चला है चालीस पार की नायिकाओ की स्वीकार्यता की ओर ...निस्संदेह ऐसे सिनेमा  नारी विमर्श को अपने ही तरह से रच रहे है .......रच रहे है ..ये बदलाव की बयार ही हमारे समाज को नयी दिशा देगा साथ ही ऐसी महिलाओ के विचारो को भी हजम कर पायेगा जो पुरुषों को प्यार और सेक्स के अंतर को समझा पायें .......और पुरुषो का मुंह खुला का खुला ही रह जाये ऐसा होता देखना मनोरंजक तो है ही सशक्तिकरण का एक सबक भी है .


फिल्म के सिनेमाटोग्राफी जबरदस्त हैं। रंगों का संयोजन और लाइट्स का बेहतरीन उपयोग फिल्म में देखने को मिलता है। विशाल भारद्वाज का संगीत और गुलजार के लिखे गीत बेहतरीन  हैं। 'दिल का मिजाज इश्किया', 'जगावे सारी रैना', 'हमारी अटरिया' जैसे गीत  पसंद आएंगे, फिल्म में बशीर बद्र साहब की शायरी मन को खुश करती है  । विशाल भारद्वाज के संवाद कैरेक्टर्स के मिजाज के अनुरूप हैं। गालियों के साथ-साथ दिल को सुकून देने वाले शब्द भी सुनने को मिलते हैं।विभिन्न ठुमरियों के माध्यम से एक काल  को जो रचा है ..विशाल ने वो नवाबी संस्कृति को एक शास्त्रीयता प्रदान करता है . एक दृश्य जिसमे बेगम पारा (माधुरी )बिरजू महाराज निर्देशित नृत्य में स्वयं को खोजती है और अपना वजूद रीक्लैम करती है .....असर पैदा करता है   . क्लाइमेक्स में बेगम अख्तर का ...”.वो जो हममे तुममे प्यार था तुम्हे याद  हो  के न याद हो” के बैकग्राउंड स्कोर के साथ  .....और सभी पात्रों का अपने बेसिक करैक्टर में लौटते हुए अपने अपने प्रिय को बचाते हुए , हिसाब चुकाते हुए ...गोलियों की धाय  धायं .......पूरी  फिल्म को अपने ऊपर लाद कर ऊँचाई दे देता है . 
मैं तो दोस्तों को  इस फिल्म को देखने का इसरार करूँगा     ...........
                                                                                                                                 [सुरेन सिंह]

सुरेन सिंह