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Sunday, August 27, 2017

'बेअकल लड़की ' : कहानी (1) - रचना भोला 'यामिनी'

आदरणीया रचना जी एक बेहद सक्रिय जीवन उल्लास में रची-पगी लेखिका हैं l फेसबुक पर आपके लिखे 'लव नोट्स' धूम मचाये हुए हैं और अभी हाल के जागरण बेस्टसेलर में आपका एक अनुवाद जगह बनाये हुए है l नवोत्पल के लिए आपने चार कहानियां सप्रेम भेजी हैं, इस कड़ी में यह पहली कहानी है l यह कहानी कितनी रियल है और कैसे यह कुछ अब्सट्रैक्ट से समझे जाने वाले पलों की महत्ता उकेरती है, यह देखते ही बनता है l

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रचना भोला ‘यामिनी’, पिछले इक्कीस वर्षों से मौलिक लेखन व अनुवाद के क्षेत्र में कार्यरत हैं। मौलिक लेखन में विविध विषयों पर पचास से अधिक पुस्तकें प्रकाशित। वे अनुवाद के क्षेत्र में राष्ट्रीय तथा अंतर्राष्ट्रीय ख्यातिनमा लेखकों की लगभग डेढ सौ से अधिक कृतियों का अंग्रेज़ी से हिंदी में अनुवाद कर चुकी हैं, जिनमें असुर, असीम आनंद की ओर, तालिबान, पारो, क्या करें जब माँ बनें शृंखला, प्रकाशन के साठ वर्ष, रहस्य से परे, आकर्षण के नियम से आगे, प्रणव मुखर्जी ; इंदिरा गांधी का प्रभावशाली दशक, एक ही ज़िंदगी काफ़ी नहीं, फ़कीर, अधिकतम से अधिक, सीता, एक रोमांचक सोवियत रूस यात्रा, औरतें ; सेक्स, लव एंड लस्ट, मन का सहज विज्ञान, तिरुपति: एक जीवन दर्षन, आॅफ़कोर्स आई लव यू ..., फ़िफ्टी शेड्स आॅ़फ ग्रे शृंखला, वार्षिक भविष्यफल: बेजान दारूवाला, बदलते विद्यालय, तेजस्वी बच्चे, क़िस्मत की ख़ोज में व ध्यान साधना का सरल अभ्यास, जीवन के अर्थ की तलाश में मनुष्य, मैंने मृत्यु के बाद का जीवन देखा है आदि उल्लेखनीय हैं।

उनके लिए उनका लेखन कर्म पैशन से प्रोफे़शन और मेडिटेशन तक जाने की एक अद्भुत यात्रा रहा है। उनके अनुसार लेखन जीवन के प्रति एक सहज स्वीकार्य भाव रहा और एक-एक शीर्षक अपने साथ चेतना के विभिन्न आयामों की ओर ले जाते हुए, जीवन में आध्यात्मिक विकास के विलक्षण अवसर प्रस्तुत करने का माध्यम बना। जब सृजनधर्मिता ही ध्यान और मनन बन जाए तो जीवन पूरी खिलावट के साथ सामने आता है जिसकी भीनी खु़शबू अपने साथ-साथ दूसरों के अस्तित्व को भी महका देती है।

लेखन व पठन-पाठन के अतिरिक्त वे पर्यटन, संगीत की विविध विधाओं, विष्वस्तरीय सिनेमा व लोक परंपराओं के अध्ययन में विषेष रुचि रखती हैं। 

rachnabhola25@gmail.com

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बेअक़ल लड़की

लड़का गुनगुनाते हुए आया तो लड़की रसोई में पीठ किए खड़ी दिखी . उसने लड़की की गर्दन के पिछले हिस्से पर हौले से अपनी उँगलियाँ फिराईं और उसकी ऒर झुका...लड़की के बदन की महक में कुछ देर पहले लगाए फेसपैक और फेसवॉश की महक इस तरह घुल गई थी जैसे लक्मे का नया परफ्यूम लगाया हो. लड़का उसकी संदली गर्दन के स्पर्श के साथ मदहोश हो, कुछ कहने ही वाला था कि लड़की अचानक मिली इस छुअन से चिहुँकी...!

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अरे गए तुम.. हद है यार, तुम्हें सुबह से दूध लाने को बोल रखा है अभी तक नहीं लाए...तुम्हारी रसोई का ये नल फिर से टपकने लगाअरे हाँ, गैस क़ी नॉब बदलवानी है और बाज़ार जाते हुए मेरे लैपटॉप बैग क़ी चेन भी ठीक करवा देना ....ये क्या तुम नहाए नहीं अभी...सच्ची पूरे मलेच्छों के ख़ानदान से हो. रसोई में खड़े-खड़े थक गई मैँ तो.. अब लंच तुम बनाओगे. सुनो..बिजली का बिल गया है. इस बार दस हज़ार से ऊपर गया है. अच्छा तुम ये चेक शर्ट्स पहन कर मुझे ऑफिस से लेने मत आया करो. स्टाफ तुम्हें देख दबी हँसी हँसता है. I feel insulted. यार ड्रेसिंग सेंस भी कोई चीज़ होती है'.' लड़की ने अपनी उधड़ी तुरपाई वाले गाउन से झाँकते बगल के बालों को dangerously ignore करते हुए अपने सौंदर्य बोध क़ी दुहाई दी. लड़के क़ी उँगलियाँ जाने कब सहम कर उसकी पेंट क़ी जेब में वापिस जा चुकी थीं. ज़ेहन से मखमली गर्दन का स्पर्श और कुछ देर पहले नासापुटों को आनंदित करती परफ्यूम क़ी महक उड़ गई थी. वह दबे पाँव चल दिया और लड़की ने विजयी मुद्रा में अपना काम जारी रखा. लड़के के सामने मन भर बातों क़ी पोटली खोल कर जो संतोष मिला था, उसके परमानन्द में मग्न लड़की कहाँ जानती थी कि उसने अभी - अभी क्या गवाँ दिया था!

Source: Pinterest


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लड़की ने गवाँ दिए थे वो क्षण जो उसके जीवन के सुन्दर सुहाग से सजे क्षण हो सकते थे.. जिनके बीच पनप सकती थी कोई बेलौस अलमस्त कविता...रची जा सकती थी कोई रोमानी कहानी... जिनके बीच बुने जा सकते थे चंद रुपहले सपने.. जब तोड़ कर लाए जा सकते थे चाँद सितारेलड़की को कहा जा सकता था परीलोक से उतरी शहज़ादी…. लड़की लड़के के बालों में फिरा सकती थी उँगलियाँ... गा सकती थी उसके लिए किसी पंजाबी गीत के कुछ बोल...मैंड्डा इश्क वी तूँ मेरा यार वी तूँ...मैंड्डा दीन वी तूँ ईमान वी तूँ.... लड़का सुना देता उसे नुसरत के कुछ बोल.. आज तकया तो लगा मुझे ऐसे...जैसे मेरी ईद हो गई..!

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लड़की ने गवाँ दिए वो क्षण जब वे कर सकते थे अपने आने वाले कल क़ी बातें ... जब वे एक-एक कप कॉफ़ी के साथ किसी किताब के बहाने जी सकते थे एक अलग ज़िन्दगी...जब वो दोहरा सकते थे अमृता इमरोज़ के किस्से..जहाँ अमृता को जब यह पता चला था कि इमरोज़ ने जिस्म क़ी भूख से पीड़ित हो कर एक बार ऐसी औरत के पास जाना चाहा था जो रोज़ के बीस रुपये लेती थी..तो अमृता के मुख से सहज ही निकला था कि अगर तुम ऐसी औरत के पास जाते तो मेरा जी करता है कि वह औरत मैं ही होती. लड़का लड़की को बता सकता था कि कजानजाकिस ने अपनी प्रेमिका से पहली भेंट के दौरान कहा था..Create an idealized image of yourself and try to resemble it .

लड़का और लड़की एक साथ पुरानी किताबों से झाँकते पात्रों के साथ बिता सकते थे कुछ वक्त... लड़का लड़की को बता सकता था कि ज़िन्दगी में आते हैं ऐसे भी पल, जब पैसों क़ी कमी एक छोटा सच बन जाती है और एक दूजे का साथ ज़िन्दगी की सबसे बड़ी नेमत हो जाता है...जब वे मिल कर गुनगुना सकते थे रबींद्र संगीत क़ी कुछ पंक्तियाँ....तोमाय गान शोनाबो..ताई तो अमाय जागिये राखो....लड़का तबले क़ी थाप देता तो शायद थोड़ा थिरक भी सकती थी लड़की...जब वे बन सकते थे बंगाली फ़िल्म 'अनुरणन' मूवी के राहुल और नंदिता....जहाँ लड़का उसे बताता कि कहीं कहीं कमी है उनके बीच अनुरणन क़ी..सुर में सुर मिलाने का खेल.. जिसे वे ऐसे क्षणों के जादू से पल में कर सकते हैं दूरजब वे एक साथ देख सकते थे कुछ ऐसी मूवीज जो उन्हें ज़िन्दगी क़े कुछ नए रंगों से वाक़िफ़ करवा सकती थीं. वे केवल हाथों में हाथ थामे बैठे रहते और लड़का लड़की क़े आगे दोहरा सकता था कवि क़ी पंक्तियाँ..... उसका हाथ, अपने हाथ में लेते हुए, मैंने सोचा, दुनिया को हाथ क़ी तरह गर्म और सुन्दर होना चाहिए..!

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लड़की ने गवाँ दिए थे वो क्षण जिनके साथ जिए जा सकते थे कुछ ऐसे पल जो सौ जन्मों पर भारी होते...जो दे सकते थे आँखों को ऐसी ख़ुमारी जो अक्सर रतजगों के बाद उभर आती है...जो दे सकते थे नाज़ुक होठों क़ी छुअन.. दो धड़कते दिलों का एक सुर- ताल में बजना...साँसों का साँसों में इस तरह घुलना कि मन, देह और आत्मा एकप्राण हो उठें....हर किन्तु-परन्तु का उस संयोग में लीन हो जाना काया का तितली के पंखों जैसे स्पर्श से मुदित हो उठना.... मौसम क़ी पहली बारिश के बाद मिटटी से उठती पहले मिलन क़ी महक...पुरुष और प्रकृति के चिर पुरातन किन्तु शाश्वत सम्बन्ध क़ी एक मधुर स्मृति...जो दिला सकते थे लड़की को एहसास कि प्रेम में पगे शब्दों के बीच रसिया अंग लगा ले तो दुनिया क़ी हर मधुर मदमाती गंध पड़ जाती है फ़ीकी....अंतरिक्ष के किसी छोर से झाँकते देवगण कर देते हैं पुष्पों क़ी वर्षा...सृष्टि लेती है अंगड़ाई और कोई कली मुस्कुरा कर खोल देती है अपनी पंखुड़ियाँ... सृजन को मिलते हैं नए आयाम....परिवेश हो उठता है दिव्यजाने किस शून्य से तिर आती है एक संगीतलहरी ...एक सागर क़ी उत्ताल तरंगऔर जलमग्न हो उठते हैं धरती और पाताल..!

कैसी बेअक़ल निकली लड़की... कितना कुछ गवाँ बैठी...!