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नवाक्षर


नवाक्षर, गोरखपुर विश्वविद्यालय की दीवारों पर पाक्षिक तौर पर सजने वाली दीवार पत्रिका थी.


1 comment:

  1. राष्ट्रकवि रामधारीसिंह दिनकर की जन्म जयंती पर
    कोटि-कोटि वन्दन - अभिनन्दन


    जनगण का आह्वान

    तानाशाही सरकारों के,
    राज बदलते देखे है ।

    पूर्व निकले सूरज भी,
    पश्चिम में ढ़लते देखे है ।।

    सिंहासन के ताज तुम्हारे,
    सिर पर हमने बांधे है ।

    पांच साल की खैर करों तुम,
    वक्त हमारे कांधे है ।।

    अभिमानों के ताज शिखर से,
    पैरों में गिरते देखे है ।

    पूर्व निकले सूरज भी,
    पश्चिम में ढ़लते देखे है ।।

    गर नही जागी सरकारें अब,
    लापरवाही मंहगी होगी ।

    फिर तो शासन, सिंहासन की,
    सता की कुरबानी होगी ।।

    सता की मीनारों के भी,
    गुम्बज बिखरते देखे है ।

    पूर्व निकले सूरज भी,
    पश्चिम में ढ़लते देखे है ।।

    तख्ते-ताज उखड़ने में भी,
    ज्यादा वक्त नही लगता है ।

    धोखे पर धोखा और शोषण,
    लोकतंत्र में नही चलता है ।।

    आंधी और उपहार समय संग,
    जनगण में पलते देखे है ।

    पूर्व निकले सूरज भी,
    पश्चिम में ढ़लते देखे है ।।

    और डेल्टा सी बेटियों, की,
    कितनी कुरबानी होगी ।

    कब तक गूंगें, बहरों सी यह,
    अस्मत अपनी पानी होगी ।।

    सोये शेर बियावान में,
    भूखे मरते देखे है ।

    पूर्व निकले सूरज भी,
    पश्चिम में ढ़लते देखे है ।।

    समय आ गया है हाथों में,
    सूरज की किरणें बनने का।

    मानस रखो कुरबानी का,
    आगे आकर कुछ करने का।।

    हिम्मत वाली बातों से ही,
    पहाड़ लूढ़कते देखे है ।

    पूर्व निकले सूरज भी,
    पश्चिम में ढ़लते देखे है ।।

    सता के मद् में आंधे इन,
    नेताओं को कुछ नही दिखता ।

    सरे-आम घटनाओ ंमें भी ,
    लेकिन इनको कुछ नही दिखता ।।

    अभिमान के घोड़े थकते ,
    इतिहास बदलते देखे है ।

    पूर्व निकले सूरज भी,
    पश्चिम में ढ़लते देखे है ।।

    अब आया है समय साथियों ,
    चिन्तन के पथ पर उतरे हम ।

    ताकत का अहसास करा दे,
    और ठोकरों से उभरे हम ।।

    आम आदमी जब जब डोला,
    राज उखड़ते देखे है ।

    पूर्व निकले सूरज भी,
    पश्चिम में ढ़लते देखे है ।।




    कवि मुकेश बोहरा अमन
    जिला संयोजक
    राष्ट्रीय कवि संगम
    बाड़मेर राजस्थान
    8104123345

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